परिशोध की प्रकाशन नीति स्पष्ट है| खुले स्तर पर पूरे भारत से शोध-पत्र आमंत्रित किए जाते हैं तथा समय-समय पर किसी प्रतिष्ठित साहित्यकार को केन्द्रित कर विशेषांक भी निकाले जाते रहे हैं; जैसे ‘गुरु गोविन्द सिंह विशेषांक’, ‘गांधी विशेषांक’, ‘पुरुषोत्तम शर्मा स्मृति-अंक’, ‘आचार्य द्विवेदी स्मृति अंक’, ‘प्रेमचन्द विशेषांक’ इत्यादि| विशेषांक निकालने से पूर्व इसकी सूचना दे दी जाती है| समय-समय पर शोध-पत्रिका के अंतिम पृष्ठों पर विभाग में हुए शोध-कार्यों का ब्यौरा भी दिया जाता है, जिससे शोधार्थियों को भविष्य में सहायता मिल सके|

शोध-पत्र भेजते समय कृपया निम्न बिन्दुओं पर ध्यान दें –

1. शोध-पत्र अधिकतम 4000 -5000 शब्दों में हो|

2. सन्दर्भ ग्रन्थ सूची का उल्लेख अवश्य करें।सन्दर्भ ग्रन्थ सूची में लेखक का उपनाम, मुख्य नाम, पुस्तक का नाम, प्रकाशन संस्थान का नाम, स्थान, प्रकाशन का वर्ष एवं पृष्ठ संख्या अंकित होना चाहिए। पत्रिका के सन्दर्भ में लेख का शीर्षक, लेखक का नाम, पत्रिका का नाम, अंक, पृष्ठ क्रम एवं प्रकाशन वर्ष दें।

3. शोध-पत्र Microsoft Office Word की फाइल मेंहिंदी के Unicode Font Size 14 में टाइप करवाकर भेजें।

4. ई-मेल द्वारा भी शोध-पत्र भेजा जा सकता है| शोध पत्र ई-मेल द्वारा मुख्य संपादक एवं संपादक के ई-मेल पते पर अथवा डाक द्वारा विभाग के पते पर भेजा जा सकता है।

5. शोध पत्रों की स्वीकृति एवं अस्वीकृति का अंतिम निर्णय सम्बंधित विषय के वरिष्ठ विशेषज्ञ की अनुशन्सा (Expert comments of Referees) से संपादक मण्डल द्वारा लिया जाता है। इस संबंध में अंतिम अधिकार संपादक मंडल को प्राप्त है जो सभी को मान्य होगा।

6. विषय विशेषज्ञ का चयन संपादक मंडल द्वारा किया जाएगा

7. विषय विशेषज्ञ द्वारा किसी शोध पत्र में संशोधन की अनुशंसा किए जाने पर उसे लेखक के पास दुबारा भेजकर एक निश्चित समय सीमा में संशोधन का अनुरोध किया जाएगा। लेखक द्वारा संशोधित शोध पत्र को मूल्यांकन के लिए पुन: विशेषज्ञ के पास संस्तुति के लिए भेजा जाएगा।

8. शोध-पत्र छापने के लिए कोई शुल्क नहीं लिया जाता|

9. शोध-पत्र प्रकाशित होने की स्थिति में लेखक को परिशोध के उस अंक की एक प्रति निशुल्क भेजी जाती है|

10. शोध पत्र के प्रकाशन हेतु लेखक को संपादक के नाम एक पत्र भेजकर स्पष्ट रूप से शोध पत्र के ‘मौलिक’ होने और इसे अन्यत्र न भेजे जाने का आश्वासन देना होगा। शोध पत्र की सामग्री कहीं से नकल (plagiarism)नहीं होनी चाहिए और इसकी जिम्मेदारी लेखक की होगी।

प्रकाशक

‘परिशोध’ का प्रकाशन पंजाब विश्वविद्यालय प्रेस, चंडीगढ़ द्वारा किया जाता है|